|
|
पद्म विभूषण से सम्मानित, जानेमाने कत्थक गुरू पंडित बिरजू महाराज मानते हैं कि नृत्य और संगीत में प्रयोग कतई ग़लत नहीं है, बशर्ते कलाकार उसके दायरे को पहचाने और अपनी पहचान को क़ायम रखे। |
|
पद्म विभूषण से सम्मानित, जानेमाने कत्थक गुरू पंडित बिरजू महाराज मानते हैं कि नृत्य और संगीत में प्रयोग कतई ग़लत नहीं है, बशर्ते कलाकार उसके दायरे को पहचाने और अपनी पहचान को क़ायम रखे ।
संगीत और नृत्य की तमाम विधाओं में निपुण बिरजू महाराज वर्तमान भारतीय फ़िल्मों में नृत्य को लेकर हो रहे प्रयोगों के प्रति चिंतित भी हैं । आज कत्थक को एक मुकाम तक पहुँचाने वाले लखनऊ घराने के इस कलाकार का शुरुआती दौर संघर्ष का रहा। वो आज भी अपने को गुरू के अलावा एक अच्छा शागिर्द और शिष्य मानते हैं।
इनका जन्म लखनऊ के एक बड़े कत्थक घराने में हुआ। पिता अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज का ख़ासा नाम था। जब बिरजू महाराज केवल नौ वर्ष के थे, तब उनके पिता जी का देहांत हो गया । बचपन अभाव और गरीबी में बीता।
ऐसे समय में उनकी गुरूबहन कपिला वात्स्यायन जो उन दिनों लखनऊ आईं और उनको अपने साथ दिल्ली ले गईं। इसी तरह उनकी कथक यात्रा शुरू हुई ।
दिल्ली में शुरुआत के दिन काफ़ी संघर्ष भरे थे। मात्र 175 रूपए की नौकरी थी। उन्होंने कोलकाता से अपने सफलता के सफ़र की शुरुआत की और फिर मुंबई में काफ़ी आगे बढ़े। इसलिए कोलकाता को अपनी माँ और मुंबई को अपना पिता कहते हैं।
इन्हें बैले नृत्य में काफ़ी रुचि थी । शुरुआत में इन्होंने मालती माधो, शाने-अवध, कुमार संभव, दालिया जैसे कितने ही कंपोजीशन तैयार किए। इसके अलावा इन्होंने कई हिन्दी फिल्मों में नृत्य निर्देशन भी किया।

























