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मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह का जन्म 6 अगस्त 1959 में राजस्थान के अलवर जिले में हुआ। मैगसेसे पुरस्कार उन्हें पानी संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए दिया गया। उन्होंने सामाजिक कार्य करने के लिए एक स्वयं सेवी संस्था की भी स्थापना की है जिसे तरुण भारत संघ कहा जाता है। |
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मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त राजेन्द्र सिंह का जन्म 6 अगस्त 1959 में राजस्थान के अलवर जिले में हुआ। मैगसेसे पुरस्कार उन्हें पानी संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए दिया गया। उन्होंने सामाजिक कार्य करने के लिए एक स्वयं सेवी संस्था की भी स्थापना की है जिसे तरुण भारत संघ कहा जाता है।
राजेन्द्र सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए किया है। इसके अलावा उन्होंने रिषिकुल आयुर्वेदिक महाविद्यालय से आयुर्वेद की भी पढ़ाई कर रखी है। जब वे छात्र थे तब वे जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े हुए थे। अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे नेशनल सर्विस वोलेंटियर से जुड़े़।
उस समय उनकी उम्र 25 साल थी जब राजेन्द्र सिंह ने अपनी नौकरी छोड़ दी और ग्रामीण विकास के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने चार लोगों को लेकर तरुण भारत संघ की स्थापना की और एक बस किराये पर लेकर एक सूदूर गांव में गये। वहां वरिष्ठ ग्रामीणों से सलाह लेकर पुराने जोहड़ों की मरम्मत करने का काम शुरू किया।
उस समय लकड़ी और खनन से संबंधित व्यापारी इस क्षेत्र में अपनी गतिविधियो से पानी की समस्या को और बढ़ा रहे थे। पानी की समस्या से त्रस्त लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे थे।
उन्होंने गांवों को समस्याओं के समाधान के लिए जागरूक करना शुरू किया। उन्होंने ग्राम सभा, महिला बैंक और नदी संसद हर गांव में बनाई।
वे गांवों को स्वावलम्बी बनाने के लिए ग्राम स्वावलम्बन अभियान चलाते हैं जिसके अंतर्गत गर्मियों के मौसम से सैकड़ों गांवों को बीज, पानी संरक्षण, भू संरक्षण इत्यादि के बारे में समझाया जाता है।
उन्होंने 1000 गांवों में लगभग दस हजार जोहड़ों की मरम्मत की या नये जोहड़ बनवाये। ये कार्य इन्होंने राजस्थान के अलवर, दौसा, सवाई माधेपुर, कारोली और जयपुर जिलों में किये। 1995 में राजेन्द्र सिंह ने नदी पहाड़ बचाओ यात्रा जयपुर से उत्तरकाशी तक की। इस यात्रा का उद्देश्य लोगों में पानी के स्रोतों और पहाड़ों का संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना था।
राजेन्द्र सिंह ने 23 दिसम्बर 2002 को राष्ट्रीय जल यात्रा की शुरूआत की। यह यात्रा दिल्ली के राजघाट से निकली और 30 राज्यों में गई। इस यात्रा में इस बात पर जोर दिया गया कि दो नदियों को जोड़ने की जरूरत नहीं है। इससे नुकसान ही होगा, कोई फायदा नहीं।
1986 में उन्होंने सरिस्का जंगल के संरक्षण के लिए 95 गांवों में कमेटियां बनाईं।
वे पेड़ बचाओ पेड़ लगाओ आंदोलन भी चलाते हैं जिसके तहत पेड़ लगाये जाते हैं और रक्षा बंधन के दिन सभी ग्रामीण पेड़ों को राखी बांधते हैं।
राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि मैं 1984 तक पानी संरक्षण के बारे में कुछ नहीं जानता था। मुझे जो भी ज्ञान हासिल हुआ वो ग्रामीणों की मदद से ही हुआ।
स्थानीय लोग उन्हें जोहड़वाले बाबा के नाम से पुकारते हैं। लेकिन ये सब इतनी आसानी से हो गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। शुरू शुरू में स्थानीय गुज्जर समुदाय के लोग राजेन्द्र सिंह और उनके साथ काम करने वाले लोगों को आतंकवादी और बच्चा उठाने वाले समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनके नेक कार्यो को देखते हुए अपनी धारणा बदल ली।
राजेन्द्र सिंह के प्रयासों का ही नतीजा है कि रूपारेल, अरवरी, सरसा, भगनी और जहाजवाली नदी जो कि लगभग मर चुकी थीं उनको पुनर्जीवित हो उठी।

























